मैं वही सिन्धु नदी…!

मैंने तारीख़ को देखा जो उठाकर, पाया हर किसी को सुकूँ मेरे किनारे आया मैंने तारीख़ को देखा है बिगड़ते-बनते मैं भी तारीख़ का हिस्सा रही हूँ सदियों तक, ख़ौफ़ज़दा रहती हूँ अक्सर यूँ भी, कि मैं तारीख़ ही बनकर न सिमट जाऊँ कहीं, जिनके जीवन का मैं आधार रही हूँ सदियों, उन्हीं लोगों की…

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