कोई भारत बर्बादी के सपने बुनता भारत भूमि पर ,

कोई मनाता आतंकी की बरसी भारत भूमि पर ।

कोई भारत मुर्दाबाद लगाता नारा भारत भूमि पर,

कोई भारत माता को गाली दे जाता भारत भूमि पर ।।

कहीं राष्ट्र विरोधी नारे हैं, चिंगारी है अंगारे हैं।

गैरों से जीते क्या जीते, अपनों के हाथों हारे हैं।।

सबकी अपनी माँगे हैं,सब झंडे लेकर बैठ गए,

आरक्षण की माँग थी जिनकी,भक्षण करने बैठ गए ।

आरक्षण की माँग थी जिनकी, भक्षण करने बैठ गए,

आज युधिष्ठिर स्वयं द्रौपदी चीर हरण को बैठ गए।।

अभिव्यक्ति की आज़ादी?

ये कैसी आज़ादी माँग रहे हैं, बेटे अपनी माता से,

हिस्सा करना चाह रहे हैं बेटे अपनी माता के।।

पर तुममें से ही कुछ बेटे हैं, लड़ते हैं जो सरहद पर,

अपनी लाशों से दीवारें चिनते हैं जो सरहद पर।।

क्या इसलिए वो फ़ना हुए कि तुम फिर ऐसे काम करो,

शहादतों पर गर्व नहीं, हत्यारों का सम्मान करो!

“आतंकियों की चिताओं पर अब लग रहे मेले,

वतन पर मिटने वालों का बाकी न कोई निशां होगा।।

” लेकिन ये दोष भी किसका है? जो पाकपरस्त नापाक इरादे वाले अब तक जि़ंदा है,

देख हमारी कायरता खुद संविधान शर्मिंदा है।।

शर्म बहुत आती है खुद को हिंदुस्तानी कहने में।

डर लगता है जिनको भारत की धरती पर रहने में।

एक बार वे जाके देखे ,दूजे मुल्क में रह के देखे,

देशद्रोही नारे देकर ,फिर साँस चैन से लेके देखे।।

बुद्धिजीवियों को लगता हो मेरी भाषा भद्र नहीं ।

लेकिन जिनको निज गौरव और आज़ादी की कद्र नहीं ।

जिनकी गर्दन मातृभूमि वंदन में झुक नहीं सकती है,

उनको मेरी कलम कभी अभिनंदन कर नहीं सकती है।।

मेरी कलम लड़ेगी शासन के भी अत्याचारों से।

युद्ध करेगी शत्रुदल से अपने तीखे वारों से।।

ये भारत भूमि मातृभूमि, ये स्वर्गभूमि ये स्वर्णभूमि,

ये युद्धभूमि ये मधुभूमि ,ये हरिभूमि ये पुण्यभूमि ।।

इस पावन भूमि पर मेरा सब कुछ ही कुर्बान है ।

कोई नाम पूछे मेरे खुदा का, कहना कि “हिंदुस्तान” है।।

-कोमल शर्मा

Contributed By: Komal Vats


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