इस व्यवस्था के ही तो मारे हुए हैं

इसलिए तो जीत कर हारे हुए हैं

वरना किसमें दम है कि हमको हरा दे?

इस करीने से हमारा सिर झुका दे!

हम वो हैं जो काम में अपने निपुण हैं

झाँक कर देखो!

हमीं में सारे गुण हैं

हम वो हैं जो छत्र ना पुरखों का धरते

काम सारे अपने ही भुजबल से करते

जाँच कर कहते हैं क़ाबिलियत बहुत है

पर ये आरक्षण की ही नीति ग़लत है

देती है कमज़ोर अर्जुन को बढ़ावा

एकलव्य का काट लेती है अंगूठा

राधेय भी इससे अछूते कब रहे हैं

दंश इस नीति के उसने भी सहे हैं

“जब तलक चप्पू चलाएगा अनाड़ी

तब तलक डूबेगी ही किश्ती तुम्हारी”

अंधकारों में तुम्हारा भाग्य होगा

दुश्मनों को यह बड़ा सौभाग्य होगा

अपने अंगों को स्वयम् जो काटते हो

जातियों में तुम जो हमको बाँटते हो

भारी हरजाना भी इसका हम भरेंगे

या दलित अथवा बिरहमन ही मरेंगे

होगा हासिल इससे भी नुक्सान ही तो

मरे कोई, मरेगा अपना हिन्दुस्तान ही तो

इसलिए कहता हूँ आरक्षण हटा दो

निर्धनों को उनका संरक्षण दिला दो

और ग़रीबी पर प्रबल इक वार कर दो

अब ग़रीबी का उठो संहार कर दो

बा-हुनर लोगों को उनका स्थान दे दो

जगति में उनको उचित सम्मान दे दो

देखना फ़िर फूल खुशियों के खिलेंगे

दुनिया में सबसे हमीं अव्वल मिलेंगे…!!

Prabhat Chaturvedi


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